Mukti – Kedarnath Singh

मुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिलामैं लिखने बैठ गया हूँ
मैं लिखना चाहता हूँ ‘पेड़’

यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना है

मैं लिखना चाहता हूँ ‘पानी’
‘आदमी’ ‘आदमी’ – मैं लिखना चाहता हूँ

एक बच्चे का हाथ

एक स्त्री का चेहरा

मैं पूरी ताकत के साथ

शब्दों को फेंकना चाहता हूँ आदमी की तरफ

यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा

मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूँ वह धमाका

जो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता है
यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा

मैं लिखना चाहता हूँ।