कविता – दिशा

हिमालय किधर है?
मैंने उस बच्‍चे से पूछा जो स्‍कूल के बाहर
पतंग उड़ा रहा था

उधर-उधर-उसने कहाँ
जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी

मैं स्‍वीकार करूँ
मैंने पहली बार जाना
हिमालय किधर है?

कविता – फसल

मैं उसे बरसों से जानता था-
एक अधेड़ किसान
थोड़ा थका
थोड़ा झुका हुआ
किसी बोझ से नहीं
सिर्फ़ धरती के उस सहज गुरुत्वाकर्षं से
जिसे वह इतना प्यार करता था
वह मानता था-
दुनिया में कुत्ते बिल्लियाँ सूअर
सबकी जगह है
इसलिए नफ़रत नहीं करता था वह
कीचड़ काई या मल से

भेड़ें उसे अच्छी लगती थीं
ऊन ज़रूरी है-वह मानता था
पर कहता था-उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है
उनके थनों की गरमाहट
जिससे खेतों में ढेले
ज़िन्दा हो जाते हैं

उसकी एक छोटी-सी दुनिया थी
छोटे-छोटे सपनों
और ठीकरों से भरी हुई
उस दुनिया में पुरखे भी रहते थे
और वे भी जो अभी पैदा नहीं हुए
महुआ उसका मित्र था
आम उसका देवता
बाँस-बबूल थे स्वजन-परिजन
और हाँ, एक छोटी-सी सूखी
नदी भी थी उस दुनिया में-
जिसे देखकर- कभी-कभी उसका मन होता था
उसे उठाकर रख ले कंधे पर
और ले जाए गंगा तक-
ताकि दोनों को फिर से जोड़ दे
पर गंगा के बारे में सोचकर
हो जाता था निहत्था!

इधर पिछले कुछ सालों से
जब गोल-गोल आलू
मिट्टी फ़ोड़कर झाँकने लगते थे जड़ों से
या फसल पककर
हो जाती थी तैयार
तो न जाने क्यों वह- हो जाता था चुप
कई-कई दिनों तक
बस यहीं पहुँचकर अटक जाती थी उसकी गाड़ी
सूर्योदय और सूर्यास्त के
विशाल पहियोंवाली

पर कहते हैं-
उस दिन इतवार था
और उस दिन वह ख़ुश था
एक पड़ोसी के पास गया
और पूछ आया आलू का भाव-ताव
पत्नी से हँसते हुए पूछा-
पूजा में कैसा रहेगा सेंहुड़ का फूल?
गली में भूँकते हुए कुत्ते से कहा-
‘ख़ुश रह चितकबरा,
ख़ुश रह!’
और निकल गया बाहर

किधर?
क्यों?
कहाँ जा रहा था वह-
अब मीडिया में इसी पर बहस है

उधर हुआ क्या
कि ज्यों ही वह पहुँचा मरखहिया मोड़
कहीं पीछे से एक भोंपू की आवाज़ आई
और कहते हैं- क्योंकि देखा किसी ने नहीं-
उसे कुचलती चली गई

अब यह हत्या थी
या आत्महत्या-इसे आप पर छोड़ता हूँ
वह तो अब सड़क के किनारे
चकवड़ घास की पत्तियों के बीच पड़ा था
और उसके होंठों में दबी थी
एक हल्की-सी मुस्कान!

उस दिन वह ख़ुश था।

Basanta – Kedarnath Singh

और बसन्त फिर आ रहा है

शाकुन्तल का एक पन्ना

मेरी अलमारी से निकलकर

हवा में फरफरा रहा है

फरफरा रहा है कि मैं उठूँ

और आस-पास फैली हुई चीज़ों के कानों में

कह दूँ ‘ना’

एक दृढ़

और छोटी-सी ‘ना’

जो सारी आवाज़ों के विरुद्ध

मेरी छाती में सुरक्षित है
मैं उठता हूँ

दरवाज़े तक जाता हूँ

शहर को देखता हूँ

हिलाता हूँ हाथ

और ज़ोर से चिल्लाता हूँ –

ना…ना…ना

मैं हैरान हूँ

मैंने कितने बरस गँवा दिये

पटरी से चलते हुए

और दुनिया से कहते हुए

हाँ हाँ हाँ… 

Naye Kabi Ka Dukh – Kedarnath Singh

दुख हूँ मैं एक नये हिन्दी कवि काबाँधो

मुझे बाँधो

पर कहाँ बाँधोगे

किस लय, किस छन्द में?
ये छोटे छोटे घर

ये बौने दरवाजे

ताले ये इतने पुराने

और साँकल इतनी जर्जर

आसमान इतना जरा सा

और हवा इतनी कम कम

नफरतयह इतनी गुमसुम सी

और प्यार यह इतना अकेला

और गोल -मोल

बाँधो

मुझे बाँधो

पर कहाँ बाँधोगे

किस लय , किस छन्द में?
क्या जीवन इसी तरह बीतेगा

शब्दों से शब्दों तक

जीने 

और जीने और जीने ‌‌और जीने के

लगातार द्वन्द में? 

Mukti – Kedarnath Singh

मुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिलामैं लिखने बैठ गया हूँ
मैं लिखना चाहता हूँ ‘पेड़’

यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना है

मैं लिखना चाहता हूँ ‘पानी’
‘आदमी’ ‘आदमी’ – मैं लिखना चाहता हूँ

एक बच्चे का हाथ

एक स्त्री का चेहरा

मैं पूरी ताकत के साथ

शब्दों को फेंकना चाहता हूँ आदमी की तरफ

यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा

मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूँ वह धमाका

जो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता है
यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा

मैं लिखना चाहता हूँ।

Nadi – Kedarnath Singh 

अगर धीरे चलोवह तुम्हे छू लेगी

दौड़ो तो छूट जाएगी नदी

अगर ले लो साथ

वह चलती चली जाएगी कहीं भी

यहाँ तक- कि कबाड़ी की दुकान तक भी

छोड़ दो

तो वही अंधेरे में 

करोड़ों तारों की आँख बचाकर

वह चुपके से रच लेगी

एक समूची दुनिया

एक छोटे से घोंघे में
सच्चाई यह है

कि तुम कहीं भी रहो

तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी

प्यार करती है एक नदी

नदी जो इस समय नहीं है इस घर में

पर होगी ज़रूर कहीं न कहीं

किसी चटाई 

या फूलदान के नीचे

चुपचाप बहती हुई
कभी सुनना

जब सारा शहर सो जाए

तो किवाड़ों पर कान लगा

धीरे-धीरे सुनना

कहीं आसपास

एक मादा घड़ियाल की कराह की तरह

सुनाई देगी नदी!

Banaras – Kedarnath Singh

इस शहर में वसंत

अचानक आता है

और जब आता है तो मैंने देखा है

लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से

उठता है धूल का एक बवंडर

और इस महान पुराने शहर की जीभ

किरकिराने लगती है
जो है वह सुगबुगाता है

जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ

आदमी दशाश्‍वमेध पर जाता है

और पाता है घाट का आखिरी पत्‍थर

कुछ और मुलायम हो गया है

सीढि़यों पर बैठे बंदरों की आँखों में

एक अजीब सी नमी है

और एक अजीब सी चमक से भर उठा है

भिखारियों के कटरों का निचाट खालीपन
तुमने कभी देखा है

खाली कटोरों में वसंत का उतरना!

यह शहर इसी तरह खुलता है

इसी तरह भरता

और खाली होता है यह शहर 

इसी तरह रोज़ रोज़ एक अनंत शव

ले जाते हैं कंधे

अँधेरी गली से

चमकती हुई गंगा की तरफ़
इस शहर में धूल

धीरे-धीरे उड़ती है

धीरे-धीरे चलते हैं लोग

धीरे-धीरे बजते हैं घनटे

शाम धीरे-धीरे होती है
यह धीरे-धीरे होना

धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय

दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को

इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है

कि हिलता नहीं है कुछ भी

कि जो चीज़ जहाँ थी

वहीं पर रखी है

कि गंगा वहीं है

कि वहीं पर बँधी है नाँव

कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ

सैकड़ों बरस से
कभी सई-साँझ

बिना किसी सूचना के

घुस जाओ इस शहर में

कभी आरती के आलोक में

इसे अचानक देखो

अद्भुत है इसकी बनावट

यह आधा जल में है

आधा मंत्र में

आधा फूल में है
आधा शव में

आधा नींद में है

आधा शंख में 

अगर ध्‍यान से देखो

तो यह आधा है

और आधा नहीं भी है
जो है वह खड़ा है

बिना किसी स्‍थंभ के

जो नहीं है उसे थामें है

राख और रोशनी के ऊँचे ऊँचे स्‍थंभ

आग के स्‍थंभ

और पानी के स्‍थंभ

धुऍं के 

खुशबू के

आदमी के उठे हुए हाथों के स्‍थंभ
किसी अलक्षित सूर्य को

देता हुआ अर्घ्‍य

शताब्दियों से इसी तरह

गंगा के जल में

अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर

अपनी दूसरी टाँग से

बिलकुल बेखबर!