प्रतीक्षा – Harivansh Rai Bachchan

मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता?

मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीण पर बज कर,
अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?

तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आने वाले,
पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले,
साँसें घूमघूम फिरफिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं,
मिलने की घड़ियाँ तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता?

उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पाँवड़े डाले,
अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपने होश सम्हाले,
तारों की महफिल ने अपनी आँख बिछा दी किस आशा से,
मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता?

बैठ कल्पना करता हूँ, पगचाप तुम्हारी मग से आती,
रगरग में चेतनता घुलकर, आँसू के कणसी झर जाती,
नमक डलीसा गल अपनापन, सागर में घुलमिलसा जाता,
अपनी बाँहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता?

साथी, सब कुछ सहना होगा – Harivansh Rai Bachchan

मानव पर जगती का शासन,
जगती पर संसृति का बंधन,
संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधों में रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

हम क्या हैं जगती के सर में!
जगती क्या, संसृति सागर में!
एक प्रबल धारा में हमको लघु तिनके-सा बहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

आओ, अपनी लघुता जानें,
अपनी निर्बलता पहचानें,
जैसे जग रहता आया है उसी तरह से रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

था तुम्हें मैंने रुलाया – Harivansh Rai Bachchan

हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा!
हाय, मेरी कटु अनिच्छा!
था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

स्नेह का वह कण तरल था,
मधु न था, न सुधा-गरल था,
एक क्षण को भी, सरलते, क्यों समझ तुमको न पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

बूँद कल की आज सागर,
सोचता हूँ बैठ तट पर –
क्यों अभी तक डूब इसमें कर न अपना अंत पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

Yatra Aur Yatri – Harivansh Rai Bachchan

साँस चलती है तुझे

चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
चल रहा है तारकों का

दल गगन में गीत गाता

चल रहा आकाश भी है

शून्य में भ्रमता-भ्रमाता
पाँव के नीचे पड़ी

अचला नहीं, यह चंचला है
एक कण भी, एक क्षण भी

एक थल पर टिक न पाता
शक्तियाँ गति की तुझे

सब ओर से घेरे हुए है

स्थान से अपने तुझे

टलना पड़ेगा ही, मुसाफिर!
साँस चलती है तुझे

चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
थे जहाँ पर गर्त पैरों

को ज़माना ही पड़ा था

पत्थरों से पाँव के

छाले छिलाना ही पड़ा था
घास मखमल-सी जहाँ थी

मन गया था लोट सहसा
थी घनी छाया जहाँ पर

तन जुड़ाना ही पड़ा था
पग परीक्षा, पग प्रलोभन

ज़ोर-कमज़ोरी भरा तू

इस तरफ डटना उधर

ढलना पड़ेगा ही, मुसाफिर
साँस चलती है तुझे

चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
शूल कुछ ऐसे, पगो में

चेतना की स्फूर्ति भरते

तेज़ चलने को विवश

करते, हमेशा जबकि गड़ते
शुक्रिया उनका कि वे

पथ को रहे प्रेरक बनाए
किन्तु कुछ ऐसे कि रुकने

के लिए मजबूर करते
और जो उत्साह का

देते कलेजा चीर, ऐसे

कंटकों का दल तुझे

दलना पड़ेगा ही, मुसाफिर
साँस चलती है तुझे

चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
सूर्य ने हँसना भुलाया,

चंद्रमा ने मुस्कुराना

और भूली यामिनी भी

तारिकाओं को जगाना
एक झोंके ने बुझाया

हाथ का भी दीप लेकिन
मत बना इसको पथिक तू

बैठ जाने का बहाना
एक कोने में हृदय के

आग तेरे जग रही है,

देखने को मग तुझे

जलना पड़ेगा ही, मुसाफिर
साँस चलती है तुझे

चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
वह कठिन पथ और कब

उसकी मुसीबत भूलती है

साँस उसकी याद करके

भी अभी तक फूलती है
यह मनुज की वीरता है

या कि उसकी बेहयाई
साथ ही आशा सुखों का

स्वप्न लेकर झूलती है
सत्य सुधियाँ, झूठ शायद

स्वप्न, पर चलना अगर है

झूठ से सच को तुझे

छलना पड़ेगा ही, मुसाफिर
साँस चलती है तुझे

चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!