do pran mile – gopal singh nepali

दो मेघ मिले बोले-डोले, बरसाकर दो-दो बूँद चले ।

भौंरों को देख उड़े भौरें, कलियों को देख हँसी कलियाँ,
कुंजों को देख निकुंज हिले, गलियों को देख बसी गलियाँ,
गुदगुदा मधुप को, फूलों को, किरणों ने कहा जवानी लो,
झोंकों से बिछुड़े झोंकों को, झरनों ने कहा, रवानी लो,
दो फूल मिले, खेले-झेले, वन की डाली पर झूल चले,
दो मेघ मिले बोले-डोले, बरसाकर दो-दो बूँद चले ।

इस जीवन के चौराहे पर, दो हृदय मिले भोले-भाले,
ऊँची नज़रों चुपचाप रहे, नीची नज़रों दोनों बोले,
दुनिया ने मुँह बिचका-बिचका, कोसा आज़ाद जवानी को,
दुनिया ने नयनों को देखा, देखा न नयन के पानी को,
दो प्राण मिले झूमे-घूमे, दुनिया की दुनिया भूल चले,
दो मेघ मिले बोले-डोले, बरसाकर दो-दो बूँद चले ।

तरुवर की ऊँची डाली पर, दो पंछी बैठे अनजाने,
दोनों का हृदय उछाल चले, जीवन के दर्द भरे गाने,
मधुरस तो भौरें पिए चले, मधु-गंध लिए चल दिया पवन,
पतझड़ आई ले गई उड़ा, वन-वन के सूखे पत्र-सुमन
दो पंछी मिले चमन में, पर चोंचों में लेकर शूल चले,
दो मेघ मिले बोले-डोले, बरसाकर दो-दो बूँद चले ।

नदियों में नदियाँ घुली-मिलीं, फिर दूर सिंधु की ओर चलीं,
धारों में लेकर ज्वार चलीं, ज्वारों में लेकर भौंर चलीं,
अचरज से देख जवानी यह, दुनिया तीरों पर खड़ी रही,
चलने वाले चल दिए और, दुनिया बेचारी पड़ी रही,
दो ज्वार मिले मझधारों में, हिलमिल सागर के कूल चले,
दो मेघ मिले बोले-डोले, बरसाकर दो-दो बूँद चले ।

हम अमर जवानी लिए चले, दुनिया ने माँगा केवल तन,
हम दिल की दौलत लुटा चले, दुनिया ने माँगा केवल धन,
तन की रक्षा को गढ़े नियम, बन गई नियम दुनिया ज्ञानी,
धन की रक्षा में बेचारी, बह गई स्वयं बनकर पानी,
धूलों में खेले हम जवान, फिर उड़ा-उड़ा कर धूल चले,
दो मेघ मिले बोले-डोले, बरसाकर दो-दो बूँद चले ।

navin kalpana karo – gopal singh nepali

निज राष्ट्र के शरीर के सिंगार के लिए
तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो,
तुम कल्पना करो।

अब देश है स्वतंत्र, मेदिनी स्वतंत्र है
मधुमास है स्वतंत्र, चांदनी स्वतंत्र है
हर दीप है स्वतंत्र, रोशनी स्वतंत्र है
अब शक्ति की ज्वलंत दामिनी स्वतंत्र है

लेकर अनंत शक्तियाँ सद्य समृद्धि की-
तुम कामना करो, किशोर कामना करो,
तुम कल्पना करो।

तन की स्वतंत्रता चरित्र का निखार है
मन की स्वतंत्रता विचार की बहार है
घर की स्वतंत्रता समाज का सिंगार है
पर देश की स्वतंत्रता अमर पुकार है

टूटे कभी न तार यह अमर पुकार का-
तुम साधना करो, अनंत साधना करो,
तुम कल्पना करो।

हम थे अभी-अभी गुलाम, यह न भूलना
करना पड़ा हमें सलाम, यह न भूलना
रोते फिरे उमर तमाम, यह न भूलना
था फूट का मिला इनाम, वह न भूलना

बीती गुलामियाँ, न लौट आएँ फिर कभी
तुम भावना करो, स्वतंत्र भावना करो
तुम कल्पना करो।

sarita – gopal singh nepali

यह लघु सरिता का बहता जल
कितना शीतल¸ कितना निर्मल¸

हिमगिरि के हिम से निकल-निकल¸
यह विमल दूध-सा हिम का जल¸
कर-कर निनाद कल-कल¸ छल-छल
बहता आता नीचे पल पल

तन का चंचल मन का विह्वल।
यह लघु सरिता का बहता जल।।

निर्मल जल की यह तेज़ धार
करके कितनी श्रृंखला पार
बहती रहती है लगातार
गिरती उठती है बार बार

रखता है तन में उतना बल
यह लघु सरिता का बहता जल।।

एकांत प्रांत निर्जन निर्जन
यह वसुधा के हिमगिरि का वन
रहता मंजुल मुखरित क्षण क्षण
लगता जैसे नंदन कानन

करता है जंगल में मंगल
यह लघु सरित का बहता जल।।

ऊँचे शिखरों से उतर-उतर¸
गिर-गिर गिरि की चट्टानों पर¸
कंकड़-कंकड़ पैदल चलकर¸
दिन-भर¸ रजनी-भर¸ जीवन-भर¸

धोता वसुधा का अन्तस्तल।
यह लघु सरिता का बहता जल।।

मिलता है उसको जब पथ पर
पथ रोके खड़ा कठिन पत्थर
आकुल आतुर दुख से कातर
सिर पटक पटक कर रो रो कर

करता है कितना कोलाहल
यह लघु सरित का बहता जल।।

हिम के पत्थर वे पिघल-पिघल¸
बन गये धरा का वारि विमल¸
सुख पाता जिससे पथिक विकल¸
पी-पीकर अंजलि भर मृदु जल¸

नित जल कर भी कितना शीतल।
यह लघु सरिता का बहता जल।।

कितना कोमल¸ कितना वत्सल¸
रे! जननी का वह अन्तस्तल¸
जिसका यह शीतल करूणा जल¸
बहता रहता युग-युग अविरल¸

गंगा¸ यमुना¸ सरयू निर्मल
यह लघु सरिता का बहता जल।।

basant git – gopal singh nepali

ओ मृगनैनी, ओ पिक बैनी,
तेरे सामने बाँसुरिया झूठी है!
रग-रग में इतना रंग भरा,
कि रंगीन चुनरिया झूठी है!

मुख भी तेरा इतना गोरा,
बिना चाँद का है पूनम!
है दरस-परस इतना शीतल,
शरीर नहीं है शबनम!
अलकें-पलकें इतनी काली,
घनश्याम बदरिया झूठी है!

रग-रग में इतना रंग भरा,
कि रंगीन चुनरिया झूठी ह !
क्या होड़ करें चन्दा तेरी,
काली सूरत धब्बे वाली!
कहने को जग को भला-बुरा,
तू हँसती और लजाती!
मौसम सच्चा तू सच्ची है,
यह सकल बदरिया झूठी है!

रग-रग में इतना रंग भरा,
कि रंगीन चुनरिया झूठी है!

कविता – दिशा

हिमालय किधर है?
मैंने उस बच्‍चे से पूछा जो स्‍कूल के बाहर
पतंग उड़ा रहा था

उधर-उधर-उसने कहाँ
जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी

मैं स्‍वीकार करूँ
मैंने पहली बार जाना
हिमालय किधर है?

कविता – फसल

मैं उसे बरसों से जानता था-
एक अधेड़ किसान
थोड़ा थका
थोड़ा झुका हुआ
किसी बोझ से नहीं
सिर्फ़ धरती के उस सहज गुरुत्वाकर्षं से
जिसे वह इतना प्यार करता था
वह मानता था-
दुनिया में कुत्ते बिल्लियाँ सूअर
सबकी जगह है
इसलिए नफ़रत नहीं करता था वह
कीचड़ काई या मल से

भेड़ें उसे अच्छी लगती थीं
ऊन ज़रूरी है-वह मानता था
पर कहता था-उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है
उनके थनों की गरमाहट
जिससे खेतों में ढेले
ज़िन्दा हो जाते हैं

उसकी एक छोटी-सी दुनिया थी
छोटे-छोटे सपनों
और ठीकरों से भरी हुई
उस दुनिया में पुरखे भी रहते थे
और वे भी जो अभी पैदा नहीं हुए
महुआ उसका मित्र था
आम उसका देवता
बाँस-बबूल थे स्वजन-परिजन
और हाँ, एक छोटी-सी सूखी
नदी भी थी उस दुनिया में-
जिसे देखकर- कभी-कभी उसका मन होता था
उसे उठाकर रख ले कंधे पर
और ले जाए गंगा तक-
ताकि दोनों को फिर से जोड़ दे
पर गंगा के बारे में सोचकर
हो जाता था निहत्था!

इधर पिछले कुछ सालों से
जब गोल-गोल आलू
मिट्टी फ़ोड़कर झाँकने लगते थे जड़ों से
या फसल पककर
हो जाती थी तैयार
तो न जाने क्यों वह- हो जाता था चुप
कई-कई दिनों तक
बस यहीं पहुँचकर अटक जाती थी उसकी गाड़ी
सूर्योदय और सूर्यास्त के
विशाल पहियोंवाली

पर कहते हैं-
उस दिन इतवार था
और उस दिन वह ख़ुश था
एक पड़ोसी के पास गया
और पूछ आया आलू का भाव-ताव
पत्नी से हँसते हुए पूछा-
पूजा में कैसा रहेगा सेंहुड़ का फूल?
गली में भूँकते हुए कुत्ते से कहा-
‘ख़ुश रह चितकबरा,
ख़ुश रह!’
और निकल गया बाहर

किधर?
क्यों?
कहाँ जा रहा था वह-
अब मीडिया में इसी पर बहस है

उधर हुआ क्या
कि ज्यों ही वह पहुँचा मरखहिया मोड़
कहीं पीछे से एक भोंपू की आवाज़ आई
और कहते हैं- क्योंकि देखा किसी ने नहीं-
उसे कुचलती चली गई

अब यह हत्या थी
या आत्महत्या-इसे आप पर छोड़ता हूँ
वह तो अब सड़क के किनारे
चकवड़ घास की पत्तियों के बीच पड़ा था
और उसके होंठों में दबी थी
एक हल्की-सी मुस्कान!

उस दिन वह ख़ुश था।

izhaar – ahmed nadeem qasmi

Tujhe izhaar-e-muhabbat se agar nafrat hai
tuu ne honToN ko larazne se to rokaa hotaa

be-niyaazii se, magar kaaNptii aavaaz ke saath
tuu ne ghabraa ke miraa naam na puuchaa hotaa

tere bas meN thii agar mash’al-e-jazbaat kii lau
tere ruKhsaar meN gulzaar na bhaRkaa hotaa

yuN to mujh se huii sirf aab-o-havaa ki baateN
apne TooTe hue fiqroN ko to parkhaa hotaa

yuuNhii be-waj’h ThiThakney ki zaruurat kyaa thii
dam-e-ruKhsat maiN agar yaad na aayaa hotaa

teraa ghammaz banaa khud tiraa andaaz-e-khiraam
dil na sambhlaa, to qadmoN ko sambhaala hota

apne badle miree tasviir nazar aa jaati
tuu ne us vaqt agar aaiinaa dekhaa hotaa

hoaslaa tujh ko na thaa mujh se judaa hone kaa
varnaa kaajal tiree aaNkhoN meN na phailaa hotaa

patthar – ahmed nadeem qasmi

ret se but na banaa ai mere achchhe fankaar

ek lamhe ko Thahar, maiN tujhe patthar laa duuN
maiN tere saamane ambaar lagaa duuN lekin
kaun se rang kaa patthar tere kaam aayegaa
surKh patthar jise dil kahatii hai bedil duniyaa
yaa vo patthraa’ii hu’ii aaNkh kaa niilaa patthar
jis meN sadiiyoN ke tahayyur ke paRe hoN Dore

kyaa tujhe ruuh ke patthar kii zaruurat hogii
jis pe haq baat bhii patthar kii tarah girtii hai
ik vo patthar hai jise kahte haiN tahziib-e-safed
us ke mar-mar meN siyah Khuun jhalak jaataa hai
ik insaaf kaa patthar bhii to hotaa hai magar
haath meN teshaa-e-zar ho to vo haath aataa hai

jitne mayyaar haiN is daur ke sab patthar haiN
sher bhii raqs bhii tasviir-o-Ghinaa bhii patthar
mere ilhaam teraa zahn-e-rasaa bhii patthar
is zamaane meN har fan kaa nishaaN patthar hai
haath patthar haiN tere merii zubaaN patthar hai
ret se but na banaa ai mere achchhe fankaa

प्रतीक्षा – Harivansh Rai Bachchan

मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता?

मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीण पर बज कर,
अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?

तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आने वाले,
पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले,
साँसें घूमघूम फिरफिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं,
मिलने की घड़ियाँ तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता?

उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पाँवड़े डाले,
अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपने होश सम्हाले,
तारों की महफिल ने अपनी आँख बिछा दी किस आशा से,
मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता?

बैठ कल्पना करता हूँ, पगचाप तुम्हारी मग से आती,
रगरग में चेतनता घुलकर, आँसू के कणसी झर जाती,
नमक डलीसा गल अपनापन, सागर में घुलमिलसा जाता,
अपनी बाँहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता?

साथी, सब कुछ सहना होगा – Harivansh Rai Bachchan

मानव पर जगती का शासन,
जगती पर संसृति का बंधन,
संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधों में रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

हम क्या हैं जगती के सर में!
जगती क्या, संसृति सागर में!
एक प्रबल धारा में हमको लघु तिनके-सा बहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

आओ, अपनी लघुता जानें,
अपनी निर्बलता पहचानें,
जैसे जग रहता आया है उसी तरह से रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

था तुम्हें मैंने रुलाया – Harivansh Rai Bachchan

हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा!
हाय, मेरी कटु अनिच्छा!
था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

स्नेह का वह कण तरल था,
मधु न था, न सुधा-गरल था,
एक क्षण को भी, सरलते, क्यों समझ तुमको न पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

बूँद कल की आज सागर,
सोचता हूँ बैठ तट पर –
क्यों अभी तक डूब इसमें कर न अपना अंत पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

Yatra Aur Yatri – Harivansh Rai Bachchan

साँस चलती है तुझे

चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
चल रहा है तारकों का

दल गगन में गीत गाता

चल रहा आकाश भी है

शून्य में भ्रमता-भ्रमाता
पाँव के नीचे पड़ी

अचला नहीं, यह चंचला है
एक कण भी, एक क्षण भी

एक थल पर टिक न पाता
शक्तियाँ गति की तुझे

सब ओर से घेरे हुए है

स्थान से अपने तुझे

टलना पड़ेगा ही, मुसाफिर!
साँस चलती है तुझे

चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
थे जहाँ पर गर्त पैरों

को ज़माना ही पड़ा था

पत्थरों से पाँव के

छाले छिलाना ही पड़ा था
घास मखमल-सी जहाँ थी

मन गया था लोट सहसा
थी घनी छाया जहाँ पर

तन जुड़ाना ही पड़ा था
पग परीक्षा, पग प्रलोभन

ज़ोर-कमज़ोरी भरा तू

इस तरफ डटना उधर

ढलना पड़ेगा ही, मुसाफिर
साँस चलती है तुझे

चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
शूल कुछ ऐसे, पगो में

चेतना की स्फूर्ति भरते

तेज़ चलने को विवश

करते, हमेशा जबकि गड़ते
शुक्रिया उनका कि वे

पथ को रहे प्रेरक बनाए
किन्तु कुछ ऐसे कि रुकने

के लिए मजबूर करते
और जो उत्साह का

देते कलेजा चीर, ऐसे

कंटकों का दल तुझे

दलना पड़ेगा ही, मुसाफिर
साँस चलती है तुझे

चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
सूर्य ने हँसना भुलाया,

चंद्रमा ने मुस्कुराना

और भूली यामिनी भी

तारिकाओं को जगाना
एक झोंके ने बुझाया

हाथ का भी दीप लेकिन
मत बना इसको पथिक तू

बैठ जाने का बहाना
एक कोने में हृदय के

आग तेरे जग रही है,

देखने को मग तुझे

जलना पड़ेगा ही, मुसाफिर
साँस चलती है तुझे

चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
वह कठिन पथ और कब

उसकी मुसीबत भूलती है

साँस उसकी याद करके

भी अभी तक फूलती है
यह मनुज की वीरता है

या कि उसकी बेहयाई
साथ ही आशा सुखों का

स्वप्न लेकर झूलती है
सत्य सुधियाँ, झूठ शायद

स्वप्न, पर चलना अगर है

झूठ से सच को तुझे

छलना पड़ेगा ही, मुसाफिर
साँस चलती है तुझे

चलना पड़ेगा ही मुसाफिर! 

शमा गुल हो गयी दिल बुझ गया परवाने का – Yaas Yagana Changezi

सिलसिला छिड़ गया जब यास के फ़साने का
शमा गुल हो गयी दिल बुझ गया परवाने का

वाए हसरत कि ताल्लुक़ न हुआ दिल को कहीं
न तो काबे का हुआ मैं न तो सनम-खाने का

खिल्वत-ए-नाज़ कुजा और कुजा अहल-ए-हवस
ज़ोर क्या चल सके फ़ानूस से परवाने का

वाह किस नाज़ से आता है तेरा दौर-ए-शबाब
जिस तरह दौर चले बज़्म में परवाने का

Mujhe Dil Kii Khataa Par – Yaas Yagana Changenzi

mujhe dil kii Khataa par ‘Yaas’ sharmaanaa nahii.n aataa
paraayaa jurm apane naam likhavaanaa nahii.n aataa

buraa ho paa-e-sar_kash kaa ki thak jaanaa nahii.n aataa
kabhii gum_raah ho kar raah par aanaa nahii.n aataa

mujhe ai naaKhudaa aaKhir kisii ko muu.Nh dikhaanaa hai
bahaanaa kar ke tanhaa paar utar jaanaa nahii.n aataa

musiibat kaa pahaa.D aaKhir kisii din kaT hii jaayegaa
mujhe sar maar kar teshe se mar jaanaa nahii.n aataa

asiiro shauq – e -aazaadii mujhe bhii gud gudaataa hai
magar chaadar se baahar paa.Nv phailaanaa nahii.n aataa

dil-e-behausalaa hai ik zaraa sii Tiis kaa meh maa.N
vo aa.Nsuu kyaa piyegaa jis ko Gam khaanaa nahii.n aataa

इल्म क्या इल्म की हकीक़त क्या – Yaas Yagana Changezi

किसकी आवाज़ कान में आई
दूर की बात ध्यान में आयी

आप आते रहे बुलाते रहे
आने वाली एक आन में आयी

यह किनारा चला कि नाव चली
कहिये क्या बात ध्यान में आयी!

इल्म क्या इल्म की हकीक़त क्या
जैसी जिसके गुमान में आयी

आँख नीचे हुई अरे यह क्या
यूं गरज़ दरम्यान में आयी

मैं पयम्बर नहीं यगाना सही
इस से क्या कसर शान में आयी

बुनाई का गीत  – केदारनाथ सिंह 

उठो सोये हुए धागोंउठो

उठो कि दर्जी की मशीन चलने लगी है

उठो कि धोबी पहुँच गया घाट पर

उठो कि नंगधड़ंग बच्चे

जा रहे हैं स्कूल

उठो मेरी सुबह के धागो

और मेरी शाम के धागों उठो
उठो कि ताना कहीं फँस रहा है

उठो कि भरनी में पड़ गई गाँठ

उठो कि नाव के पाल में

कुछ सूत कम पड़ रहे हैं
उठो

झाड़न में

मोजो में

टाट में

दरियों में दबे हुए धागो उठो

उठो कि कहीं कुछ गलत हो गया है

उठो कि इस दुनिया का सारा कपड़ा

फिर से बुनना होगा

उठो मेरे टूटे हुए धागो

और मेरे उलझे हुए धागो उठो
उठो 

कि बुनने का समय हो रहा है

Basanta – Kedarnath Singh

और बसन्त फिर आ रहा है

शाकुन्तल का एक पन्ना

मेरी अलमारी से निकलकर

हवा में फरफरा रहा है

फरफरा रहा है कि मैं उठूँ

और आस-पास फैली हुई चीज़ों के कानों में

कह दूँ ‘ना’

एक दृढ़

और छोटी-सी ‘ना’

जो सारी आवाज़ों के विरुद्ध

मेरी छाती में सुरक्षित है
मैं उठता हूँ

दरवाज़े तक जाता हूँ

शहर को देखता हूँ

हिलाता हूँ हाथ

और ज़ोर से चिल्लाता हूँ –

ना…ना…ना

मैं हैरान हूँ

मैंने कितने बरस गँवा दिये

पटरी से चलते हुए

और दुनिया से कहते हुए

हाँ हाँ हाँ… 

Poem – Corruption

शीश कटाते फौजी देखे, 

आँख दिखाता पाकिस्तान, 

भाव गिराता रुपया देखा, 
जान गँवाता हुआ किसान, 
बहनो की इज्ज़त लुटती देखीं, 

काम खोजता हर नौजवान, 

कोई तो मुझको यह बता दे..

यह कैसा भारत निर्माण..
अन्न गोदामो में सड़ते देखा, 
भूख से मरता हिंदुस्तान, 
घोटालो की सत्ता देखीं, 
लूटता हुआ यह हिंदुस्तान, 
आपस में लड़कर भाई-भाई, 

जा रहे है क्यों श्मशान, 

कोई तो मुझको यह बता दे..

यह कैसा भारत निर्माण..

पैसो के आगे बिकता देखा, 
हर इंन्सान का ईमान, 
ईमानदारी को कुचलते देखा, 
तनकर चलता बईमान, 
कदम कदम पर होते देखा, 

देश की गरीबो का अपमान, 

कोई तो मुझको यह बता दे..

यह कैसा भारत निर्माण…! ! ३! ! 

हिंसा को मैंने बढ़ते देखा, 
अहिंसा का होता कत्त्लेआम, 
गिरगिट का रंग बदलने जैसा, 
रूप बदलता हर इंसान, 

आपस में हमने लड़ते देखा, 
राम हो या हो रहमान, 
कोई तो मुझको यह बता दे..
यह कैसा भारत निर्माण…
यह कैसा भारत निर्माण….

पानी में घिरे हुए लोग  – केदारनाथ सिंह 

पानी में घिरे हुए लोगप्रार्थना नहीं करते

वे पूरे विश्वास से देखते हैं पानी को

और एक दिन

बिना किसी सूचना के

खच्चर बैल या भैंस की पीठ पर

घर-असबाब लादकर

चल देते हैं कहीं और
यह कितना अद्भुत है

कि बाढ़ चाहे जितनी भयानक हो

उन्हें पानी में थोड़ी-सी जगह ज़रूर मिल जाती है

थोड़ी-सी धूप

थोड़ा-सा आसमान

फिर वे गाड़ देते हैं खम्भे

तान देते हैं बोरे

उलझा देते हैं मूंज की रस्सियां और टाट

पानी में घिरे हुए लोग

अपने साथ ले आते हैं पुआल की गंध

वे ले आते हैं आम की गुठलियां

खाली टिन

भुने हुए चने

वे ले आते हैं चिलम और आग
फिर बह जाते हैं उनके मवेशी

उनकी पूजा की घंटी बह जाती है

बह जाती है महावीर जी की आदमकद मूर्ति

घरों की कच्ची दीवारें

दीवारों पर बने हुए हाथी-घोड़े

फूल-पत्ते

पाट-पटोरे

सब बह जाते हैं

मगर पानी में घिरे हुए लोग

शिकायत नहीं करते

वे हर कीमत पर अपनी चिलम के छेद में

कहीं न कहीं बचा रखते हैं

थोड़ी-सी आग
फिर डूब जाता है सूरज

कहीं से आती हैं

पानी पर तैरती हुई

लोगों के बोलने की तेज आवाजें

कहीं से उठता है धुआं

पेड़ों पर मंडराता हुआ

और पानी में घिरे हुए लोग

हो जाते हैं बेचैन
वे जला देते हैं

एक टुटही लालटेन

टांग देते हैं किसी ऊंचे बांस पर

ताकि उनके होने की खबर

पानी के पार तक पहुंचती रहे
फिर उस मद्धिम रोशनी में

पानी की आंखों में

आंखें डाले हुए

वे रात-भर खड़े रहते हैं

पानी के सामने

पानी की तरफ

पानी के खिलाफ
सिर्फ उनके अंदर

अरार की तरह

हर बार कुछ टूटता है

हर बार पानी में कुछ गिरता है

छपाक……..छपाक……. 

Naye Kabi Ka Dukh – Kedarnath Singh

दुख हूँ मैं एक नये हिन्दी कवि काबाँधो

मुझे बाँधो

पर कहाँ बाँधोगे

किस लय, किस छन्द में?
ये छोटे छोटे घर

ये बौने दरवाजे

ताले ये इतने पुराने

और साँकल इतनी जर्जर

आसमान इतना जरा सा

और हवा इतनी कम कम

नफरतयह इतनी गुमसुम सी

और प्यार यह इतना अकेला

और गोल -मोल

बाँधो

मुझे बाँधो

पर कहाँ बाँधोगे

किस लय , किस छन्द में?
क्या जीवन इसी तरह बीतेगा

शब्दों से शब्दों तक

जीने 

और जीने और जीने ‌‌और जीने के

लगातार द्वन्द में? 

Mukti – Kedarnath Singh

मुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिलामैं लिखने बैठ गया हूँ
मैं लिखना चाहता हूँ ‘पेड़’

यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना है

मैं लिखना चाहता हूँ ‘पानी’
‘आदमी’ ‘आदमी’ – मैं लिखना चाहता हूँ

एक बच्चे का हाथ

एक स्त्री का चेहरा

मैं पूरी ताकत के साथ

शब्दों को फेंकना चाहता हूँ आदमी की तरफ

यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा

मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूँ वह धमाका

जो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता है
यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा

मैं लिखना चाहता हूँ।

Meri Bhasa Ke Log – Kedarnath Singh 

मेरी भाषा के लोग

मेरी सड़क के लोग हैं
सड़क के लोग सारी दुनिया के लोग
पिछली रात मैंने एक सपना देखा

कि दुनिया के सारे लोग

एक बस में बैठे हैं

और हिंदी बोल रहे हैं

फिर वह पीली-सी बस

हवा में गायब हो गई

और मेरे पास बच गई सिर्फ़ मेरी हिंदी

जो अंतिम सिक्के की तरह

हमेशा बच जाती है मेरे पास

हर मुश्किल में
कहती वह कुछ नहीं

पर बिना कहे भी जानती है मेरी जीभ

कि उसकी खाल पर चोटों के

कितने निशान हैं

कि आती नहीं नींद उसकी कई संज्ञाओं को

दुखते हैं अक्सर कई विशेषण
पर इन सबके बीच

असंख्य होठों पर

एक छोटी-सी खुशी से थरथराती रहती है यह !
तुम झांक आओ सारे सरकारी कार्यालय

पूछ लो मेज से

दीवारों से पूछ लो

छान डालो फ़ाइलों के ऊंचे-ऊंचे

मनहूस पहाड़

कहीं मिलेगा ही नहीं

इसका एक भी अक्षर

और यह नहीं जानती इसके लिए

अगर ईश्वर को नहीं

तो फिर किसे धन्यवाद दे !
मेरा अनुरोध है —

भरे चौराहे पर करबद्ध अनुरोध —

कि राज नहीं — भाषा

भाषा — भाषा — सिर्फ़ भाषा रहने दो

मेरी भाषा को ।

इसमें भरा है

पास-पड़ोस और दूर-दराज़ की

इतनी आवाजों का बूंद-बूंद अर्क

कि मैं जब भी इसे बोलता हूं

तो कहीं गहरे

अरबी तुर्की बांग्ला तेलुगु

यहां तक कि एक पत्ती के

हिलने की आवाज भी

सब बोलता हूं जरा-जरा

जब बोलता हूं हिंदी
पर जब भी बोलता हूं

यह लगता है —

पूरे व्याकरण में

एक कारक की बेचैनी हूं

एक तद्भव का दुख

तत्सम के पड़ोस में । 

Nadi – Kedarnath Singh 

अगर धीरे चलोवह तुम्हे छू लेगी

दौड़ो तो छूट जाएगी नदी

अगर ले लो साथ

वह चलती चली जाएगी कहीं भी

यहाँ तक- कि कबाड़ी की दुकान तक भी

छोड़ दो

तो वही अंधेरे में 

करोड़ों तारों की आँख बचाकर

वह चुपके से रच लेगी

एक समूची दुनिया

एक छोटे से घोंघे में
सच्चाई यह है

कि तुम कहीं भी रहो

तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी

प्यार करती है एक नदी

नदी जो इस समय नहीं है इस घर में

पर होगी ज़रूर कहीं न कहीं

किसी चटाई 

या फूलदान के नीचे

चुपचाप बहती हुई
कभी सुनना

जब सारा शहर सो जाए

तो किवाड़ों पर कान लगा

धीरे-धीरे सुनना

कहीं आसपास

एक मादा घड़ियाल की कराह की तरह

सुनाई देगी नदी!

अंधेरे पाख का चांद – केदारनाथ सिंह 

जैसे जेल में लालटेनचाँद उसी तरह

एक पेड़ की नंगी डाल से झूलता हुआ

और हम

यानी पृथ्वी के सारे के सारे क़ैदी खुश

कि चलो कुछ तो है

जिसमें हम देख सकते हैं

एक-दूसरे का चेहरा! 

Banaras – Kedarnath Singh

इस शहर में वसंत

अचानक आता है

और जब आता है तो मैंने देखा है

लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से

उठता है धूल का एक बवंडर

और इस महान पुराने शहर की जीभ

किरकिराने लगती है
जो है वह सुगबुगाता है

जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ

आदमी दशाश्‍वमेध पर जाता है

और पाता है घाट का आखिरी पत्‍थर

कुछ और मुलायम हो गया है

सीढि़यों पर बैठे बंदरों की आँखों में

एक अजीब सी नमी है

और एक अजीब सी चमक से भर उठा है

भिखारियों के कटरों का निचाट खालीपन
तुमने कभी देखा है

खाली कटोरों में वसंत का उतरना!

यह शहर इसी तरह खुलता है

इसी तरह भरता

और खाली होता है यह शहर 

इसी तरह रोज़ रोज़ एक अनंत शव

ले जाते हैं कंधे

अँधेरी गली से

चमकती हुई गंगा की तरफ़
इस शहर में धूल

धीरे-धीरे उड़ती है

धीरे-धीरे चलते हैं लोग

धीरे-धीरे बजते हैं घनटे

शाम धीरे-धीरे होती है
यह धीरे-धीरे होना

धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय

दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को

इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है

कि हिलता नहीं है कुछ भी

कि जो चीज़ जहाँ थी

वहीं पर रखी है

कि गंगा वहीं है

कि वहीं पर बँधी है नाँव

कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ

सैकड़ों बरस से
कभी सई-साँझ

बिना किसी सूचना के

घुस जाओ इस शहर में

कभी आरती के आलोक में

इसे अचानक देखो

अद्भुत है इसकी बनावट

यह आधा जल में है

आधा मंत्र में

आधा फूल में है
आधा शव में

आधा नींद में है

आधा शंख में 

अगर ध्‍यान से देखो

तो यह आधा है

और आधा नहीं भी है
जो है वह खड़ा है

बिना किसी स्‍थंभ के

जो नहीं है उसे थामें है

राख और रोशनी के ऊँचे ऊँचे स्‍थंभ

आग के स्‍थंभ

और पानी के स्‍थंभ

धुऍं के 

खुशबू के

आदमी के उठे हुए हाथों के स्‍थंभ
किसी अलक्षित सूर्य को

देता हुआ अर्घ्‍य

शताब्दियों से इसी तरह

गंगा के जल में

अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर

अपनी दूसरी टाँग से

बिलकुल बेखबर!