Basanta – Kedarnath Singh

और बसन्त फिर आ रहा है

शाकुन्तल का एक पन्ना

मेरी अलमारी से निकलकर

हवा में फरफरा रहा है

फरफरा रहा है कि मैं उठूँ

और आस-पास फैली हुई चीज़ों के कानों में

कह दूँ ‘ना’

एक दृढ़

और छोटी-सी ‘ना’

जो सारी आवाज़ों के विरुद्ध

मेरी छाती में सुरक्षित है
मैं उठता हूँ

दरवाज़े तक जाता हूँ

शहर को देखता हूँ

हिलाता हूँ हाथ

और ज़ोर से चिल्लाता हूँ –

ना…ना…ना

मैं हैरान हूँ

मैंने कितने बरस गँवा दिये

पटरी से चलते हुए

और दुनिया से कहते हुए

हाँ हाँ हाँ… 

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