Naye Kabi Ka Dukh – Kedarnath Singh

दुख हूँ मैं एक नये हिन्दी कवि काबाँधो

मुझे बाँधो

पर कहाँ बाँधोगे

किस लय, किस छन्द में?
ये छोटे छोटे घर

ये बौने दरवाजे

ताले ये इतने पुराने

और साँकल इतनी जर्जर

आसमान इतना जरा सा

और हवा इतनी कम कम

नफरतयह इतनी गुमसुम सी

और प्यार यह इतना अकेला

और गोल -मोल

बाँधो

मुझे बाँधो

पर कहाँ बाँधोगे

किस लय , किस छन्द में?
क्या जीवन इसी तरह बीतेगा

शब्दों से शब्दों तक

जीने 

और जीने और जीने ‌‌और जीने के

लगातार द्वन्द में? 

Mukti – Kedarnath Singh

मुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिलामैं लिखने बैठ गया हूँ
मैं लिखना चाहता हूँ ‘पेड़’

यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना है

मैं लिखना चाहता हूँ ‘पानी’
‘आदमी’ ‘आदमी’ – मैं लिखना चाहता हूँ

एक बच्चे का हाथ

एक स्त्री का चेहरा

मैं पूरी ताकत के साथ

शब्दों को फेंकना चाहता हूँ आदमी की तरफ

यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा

मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूँ वह धमाका

जो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता है
यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा

मैं लिखना चाहता हूँ।