Piano – Pavol Janik 

The moment we each have our own keyTo the same flat

I’ll shift a piece of the garden

To the second floor.

Sometimes I’ll come personally.

Clean

And carefully shaved

To listen to home concerts.

I’ll come for sure

Clumsily like a piano,

And always well-tempered.

On the Line Man – Wowan & Black – Pavol Janik

You escape from melike gas.

With astonishment I watch

how with a single scrawl of your legs

you ignite your silk dress.
With such blinding nakedness you pre-empt sky-blue flame.
Blazingly ablaze and perhaps wholly otherwise

I address a fire

which you will no longer damp down.
That time I wanted to declare at least what was essential

to all chance passers-by,

to all chance passing aircraft.
So under such circumstances who wouldn’t have spoilt it?
(1981) 

अंधेरे पाख का चांद – केदारनाथ सिंह 

जैसे जेल में लालटेनचाँद उसी तरह

एक पेड़ की नंगी डाल से झूलता हुआ

और हम

यानी पृथ्वी के सारे के सारे क़ैदी खुश

कि चलो कुछ तो है

जिसमें हम देख सकते हैं

एक-दूसरे का चेहरा! 

Banaras – Kedarnath Singh

इस शहर में वसंत

अचानक आता है

और जब आता है तो मैंने देखा है

लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से

उठता है धूल का एक बवंडर

और इस महान पुराने शहर की जीभ

किरकिराने लगती है
जो है वह सुगबुगाता है

जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ

आदमी दशाश्‍वमेध पर जाता है

और पाता है घाट का आखिरी पत्‍थर

कुछ और मुलायम हो गया है

सीढि़यों पर बैठे बंदरों की आँखों में

एक अजीब सी नमी है

और एक अजीब सी चमक से भर उठा है

भिखारियों के कटरों का निचाट खालीपन
तुमने कभी देखा है

खाली कटोरों में वसंत का उतरना!

यह शहर इसी तरह खुलता है

इसी तरह भरता

और खाली होता है यह शहर 

इसी तरह रोज़ रोज़ एक अनंत शव

ले जाते हैं कंधे

अँधेरी गली से

चमकती हुई गंगा की तरफ़
इस शहर में धूल

धीरे-धीरे उड़ती है

धीरे-धीरे चलते हैं लोग

धीरे-धीरे बजते हैं घनटे

शाम धीरे-धीरे होती है
यह धीरे-धीरे होना

धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय

दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को

इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है

कि हिलता नहीं है कुछ भी

कि जो चीज़ जहाँ थी

वहीं पर रखी है

कि गंगा वहीं है

कि वहीं पर बँधी है नाँव

कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ

सैकड़ों बरस से
कभी सई-साँझ

बिना किसी सूचना के

घुस जाओ इस शहर में

कभी आरती के आलोक में

इसे अचानक देखो

अद्भुत है इसकी बनावट

यह आधा जल में है

आधा मंत्र में

आधा फूल में है
आधा शव में

आधा नींद में है

आधा शंख में 

अगर ध्‍यान से देखो

तो यह आधा है

और आधा नहीं भी है
जो है वह खड़ा है

बिना किसी स्‍थंभ के

जो नहीं है उसे थामें है

राख और रोशनी के ऊँचे ऊँचे स्‍थंभ

आग के स्‍थंभ

और पानी के स्‍थंभ

धुऍं के 

खुशबू के

आदमी के उठे हुए हाथों के स्‍थंभ
किसी अलक्षित सूर्य को

देता हुआ अर्घ्‍य

शताब्दियों से इसी तरह

गंगा के जल में

अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर

अपनी दूसरी टाँग से

बिलकुल बेखबर!